आकाशी लालटेन (स्काय लेन्टर्न) के बारे में
आकाशी लालटेन (खूम फे, खूम लॉय, आग का गुब्बारा, जिन्हें प्रसार माध्यमों में युएफ़ओ आकार के गुब्बारों से जाना जाता हैं) वे पारंपारिक तोर पर मोम वाले ईंधन से ऊर्जा उत्पन्न करते वाँस के कोर के ऊपर तैली चावल के कागज से बने होते हैं।
इन दिनों, आकाशी लालटेन शहतून के कागज से बनाए जाते हैं, क्युँकि वह ओर बहुत वैविध्यता से भरे और त्वरित उपलब्द होते हैं।
जब आकाशी लालटेन में ज्वाला जलाई जाती हैं, तब ईंधन से उत्पन्न होती ऊर्जा से उत्पन्न होती गर्मी उसे ऊँचाई प्रदान करती हैं (गर्म हवाई गुब्बारा की तरह), और लालटेन को आकाश में ऊंचे चडाने की वजह बनाती हैं।
आकाशी लालटेन और उसके ईंधन से ऊर्जा उत्पन्न करती चीज, कई सारे रंगो और आकारो में आती हैं। लालटेन का आकार, जलवायु परिस्थितियां और कानूनी ऊँचाई के नियंत्रणो के ऊपर ऊडान समय आधारित होता हैं, जो कुछ देशो में बदलता हैं।
एक बार ईंधन से उत्पन्न हुई ऊर्जा खत्म हो जाती हैं, आकाशी लालटेन आसानी से उडकर नीचे जमीन पर वापस आ जाता हैं।
इतिहास
चियांग मेई, उत्तरी थायलेन्ड में, आकाशी लालटेनों को "खूम लॉय" नाम से जाना जाता हैं। पारंपारिक उत्तरी थाई (लाना) लोग पवित्र उत्सवों और अन्य विशेष प्रसंगो के लिए, आकाशी लालटेन का इस्तेमाल साल भर करते हैं। एक खास उत्सव, लॉय क्रेटोन्ग उत्सव या यिपेंग लालटेन उत्सव जिसमें; युगलों और चहितें लोग नदी किनारे हस्तरचित फूलों से सजाई चीजों (क्रेटोंग) को पानी में तैराने, और 'खूम लॉय' को साथ में छोडने के लिए ईकट्ठा होते हैं। यह सामान्यतः बौध्ध धर्म के कैलेन्डर के मुताबिक बारवें चंद्रमां के माह, सामान्यतः नवम्बर में पूर्ण चंद्र के दौरान मनाया जाता हैं।
'क्रेटोंग' और 'खूम लॉय' छौडना अच्छा भाग्य माना जाता हैं, क्युँकि कई सारे थाई लोग, खास कर के बौध्ध धर्म का अनुगमन करने वाले लोग, मानते हैं कि वे आपकी समस्याओं और चिंताओं को दूर बहाने का चिह्न हैं। मंदिरो और मठों में लालटेन चढाना एक परंपरा हैं, क्युँकि लालटेन की ज्वाला चतुराई चिह्नित करती हैं, ऐसा कहा जाने से, चढावा देने वाले मानते हैं कि वे वापस रोशनी की ज्योति पायेंगे। लालटेन का प्रकाश उन्हें 'सही मार्ग' दिखलाता हैं।
आकाशी लालटेनों की तारीख पीछले कई शतकें सालों पूरानी हैं, जब से फौंजीयों ने उन्हें निशानी देने के साधन के तौर पर इस्तेमाल किया, जिसे बाद में सामान्य लोगों द्वारा स्वीकृति मीली, जिन्होंने उसका इस्तेमाल उनकी आशाओं को स्वर्ग तक पहुँचाने के लिए किया।
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